आज प्रधानमंत्रित्व काल के आधार पर मने कौन कितने समय तक प्रधानमंत्री रहा, मोदी जी के नेहरू को पछाड़ने की ब्रेकिंग न्यूज बनाई जा रही है। सभी गोदी चैनल और पार्टी समर्थित पत्रकारों को इस काम पर लगा दिया गया है।
बताया जा रहा है कि मोदीजी सर्वाधिक काल तक निर्वाचित होने वाले प्रधानमंत्री हो गए हैं और नेहरू अब नंबर दो पर हैं।
इसके लिए 1952 से नेहरू के कार्यकाल की शुरुआत विज्ञापित की जा रही है।
मानो 1952 से पहले नेहरू प्रधानमंत्री नहीं थे और सन 47 से 52 तक भारत बगैर प्रधानमंत्री के ही रहा।
अपने पक्ष में आंकड़े दिखाने के लिए ये कुछ भी कर सकते हैं। 70 साल बाद प्रधानमंत्री बनने वाले शख़्स को नेहरू से बड़ा बनना है। वह नेहरू के आभामंडल से मुक्त ही नहीं हो पा रहा है। इस कुंठित प्रतिद्वंद्विता के लिए जो भी करना पड़े, किया जाएगा।
अब अगर नेहरू को 47 से प्रधानमंत्री मान लेंगे तो 5 वर्ष की अवधि और जुड़ जाएगी। फिर तो और दिक्कत बढ़ जाएगी। इसलिए नेहरू को पछाड़ने के लिए आसान तरीका यही है कि 1952 से उनका प्रधानमंत्री बनना माना जाय।
ऐसे तो ये कल को संविधान को भी नहीं मानेंगे जैसे कि इनके वैचारिक पुरखे नहीं मानते थे। इनको पता होना चाहिए कि संविधान के बनने तक और उसके अधीन नए विधान मंडल गठित होने तक निर्वाचित संविधान सभा को ही संसद के रूप में काम करना था। अर्थात नेहरू उस संसद के तहत प्रधानमंत्री थे जो प्रकारांतर से संविधान सभा थी और यह संविधान सभा पूर्णतः निर्वाचित थी।
और वैसे भी जिस आम चुनाव की बात की जा रही है, बावजूद इसके कि तत्कालीन परिस्थितियां चुनाव के अनुकूल नहीं थीं, क्योंकि देश नया-नया स्वतंत्र हुआ था, फिर भी अगर चुनाव होते तो कौन सी पार्टी सरकार बनाती यह बताने की जरूरत नहीं। और पार्टी किसे प्रधानमंत्री चुनती यह भी बताने की जरूरत नहीं। ठीक वैसे ही जैसे मोदी जी पार्टी द्वारा चुन लिए गए।
ख़ैर नेहरू होना इतना आसान भी कहाँ! यह सब कवायद उसी लिए तो है। जब कोई महत्वपूर्ण उपलब्धि खाते में न हो तो ऐसी ही तुलनाएँ अपना डंका अपने आप बजवाने के काम आती हैं। सो वंदन गायन अभियान शुरू हो चुका है।
हालांकि तुलना तो इस पर होनी चाहिए कि कौन कहाँ तक विकास की यात्रा को तय कर सका, कौन कितने प्रतिमानों को गढ़ सका, कौन किस सीमा तक देश के आधारभूत ढांचे में क्रांतिकारी बदलाव ला सका है, लेकिन बात हो रही है सत्तासीन होने की अवधि को लेकर।
तथ्यात्मक रूप से देखें तो 15 अगस्त 1947 से नेहरू जी की मृत्यु तक वे मोटा-मोटा 17 साल सत्तासीन रहे।
जबकि मोदी जी अपने प्रथम कार्यकाल 2014 से आज तक लगभग 12 वर्ष ही प्रधानमंत्री रहे हैं।
अगर नेहरू और जिंदा रहते तो यह अवधि और बढ़ती क्योंकि कांग्रेस 1964 के बाद भी 1977 तक लगातार केंद्र की सत्ता में रही।
ख़ैर छोड़िए ! यह महत्वपूर्ण कतई नहीं हो सकता कि कौन कितने समय तक प्रधानमंत्री रहा, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि आपका नेतृत्व कैसा रहा?
आपने शासन कैसा चलाया?
क्या आपके साथी मंत्री सहयोगी की भूमिका में हैं या आपके अधीनस्थ की भूमिका में हैं?
विपक्ष के साथ आपने तालमेल बिठाया या फिर उसे देश विरोधी ताकतों से मिले होने का तमगा दे दिया?
संसद में आपकी कार्य शैली असहमति से सहमति के स्थापन की दिशा में आगे बढ़ने के प्रयासों में रही या फिर आप द्वारा अलोकतांत्रिक तरीके अपनाते हुए सदस्यों को निलंबित करते हुए विलम्बित विधेयकों को कानूनी रूप दिये जाने में रही?
आपकी स्वीकार्यता निष्पक्ष चुनावों का प्रतिफल है या फिर चुनाव आयोग के कर्णधार मुख्य चुनाव आयुक्त खुद आपके चुनाव का परिणाम है?
आप जनता की इच्छा का परिणाम हैं या आप खुद अपने हिसाब से अपने वोटरों का चयन कर रहे हैं, ताकि आपका चयन सुनिश्चित रहे?
महत्वपूर्ण यह है कि आपके शासन में संविधानिक संस्थाओं की स्थिति कितनी मजबूत या कितनी कमजोर हुई है। प्रधानमंत्री के रूप में आपकी समयावधि महत्वपूर्ण नहीं है बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि आपने किया क्या?
महत्वपूर्ण यह है कि इस बीच लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति सामूहिक चेतना का स्तर कैसा रहा, उनकी भागीदारी कैसी थी और आपके द्वारा किस हद तक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का निर्वाह किया गया?
अगर समयावधि के हिसाब से ही प्रधानमंत्री की अहमियत या लोकप्रियता तय होती तो लाल बहादुर शास्त्री जी तो कब के भुला दिए गए होते।
आपका शासन तब महत्वपूर्ण माना जाएगा जब आप अपनी नीतियों, उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए पत्रकारों के सवालों का खुलकर जवाब दें। खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मानक बनती है।
यहां महत्वपूर्ण यह है कि मुख्यधारा का मीडिया कितना स्वायत्त है?
वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत की स्थिति क्या है?
क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि अभी 2026 की जारी रिपोर्ट में भारत 157 वें नंबर पर है।
कहने की जरूरत नहीं कि आप यहां भी शून्य हैं।
स्वतंत्रता के बाद से प्रधानमंत्रियों ने लगातार प्रेस से संवाद कायम किया है, क्योंकि सवाल-जवाब स्वस्थ लोकतांत्रिक परम्पराओं की निशानी होती है। हम देखते हैं कि नेहरू ने लगभग 75 प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं। हालाँकि वे विदेशों में भी खुलकर अपनी बात रखते रहे हैं।
विश्वविद्यालयों व आधारभूत उद्योगों की स्थापना, चिकित्सा और शिक्षा की सुलभता, शिक्षा के बाजारीकरण को रोकना, रोजगार की उपलब्धता आदि-आदि मानक ही आपके कार्यकाल को अच्छा या बुरा बताएंगे न कि आप कितने दिन पदासीन रहे यह।
आपकी मजबूती का आलम तो यह है कि आप सेना की भरती भी संविदा पर ले आए!
जरूरी यह भी देखना है कि आपकी नीतियां लोक केंद्रित हैं या चंद पूंजीपतियों के नाम गिरवी। आप आधारभूत बदलावों के इच्छुक हैं या चुनावी वैतरणी को पार करने के लिए दी गई रेवड़ियों के!
महत्वपूर्ण यह है कि आप रचनात्मक बदलाव चाहते हैं या बने-बनाए संस्थानों का नाम परिवर्तन कर अपनी कुंठा का प्रदर्शन?
महत्वपूर्ण यह भी है कि आपके क्रियाकलापों से देश संगठित और एकत्व भाव से बढ़ा है या समाज जाति,क्षेत्र, भाषा और धर्म के बीच ध्रुवीकृत?
और हाँ, महत्वपूर्ण यह है कि देश की विदेश नीति के निर्धारण में भारत की अहमियत वैश्विक संदर्भों में क्या है?
क्या इससे इंकार किया जा सकता है कि नेहरू जी के समय हमारी गुटनिरपेक्षता की नीति वैश्विक शक्तियों के नीति निर्णयों को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती थी।
आज तो हमारे पड़ोसी देश जो कि क्षेत्रफल में हमारे किसी एक प्रांत से भी कम हो सकते हैं, हमारे साथ नहीं खड़े हो रहे हैं! आखिर क्यों?
अभी ओपरेशन सिंदूर में कितने देशों का साथ हमें मिला, कोई बताएगा?
वास्तविकता तो यह है कि अभी गत वर्षों में जिस तरह अमेरिका ने हमारे देशवासियों को प्रवास की तकनीकी मामलों को आधार बनाकर जंजीरों और बेड़ियों में भारत भेजा, वह शर्मनाक है। प्रतिवाद करना तो दूर हमने उन जहाजों को देश की राजधानी से दूर छोटे शहर में रात के अंधेरों में उतरवाया ताकि जंजीरो में जकड़े लोग लोगों की नज़रों में न आ सके।
इसके अलावा क्या नेहरू के समय भारत को किसी अन्य देश के मुखिया के चुनाव में प्रचारक की हैसियत तक गिराया गया?
अगली बार ट्रंप सरकार का नारा किसी पूर्ववर्ती प्रधानमंत्री ने दिया?
क्या यह आचरण संप्रभु भारत की गरिमा के प्रतिकूल नहीं था?
क्या पूर्व में किसी प्रधानमंत्री ने पूरी पंचवर्षीय चुनावी सक्रियता का प्रदर्शन किया?
नहीं न!
तो तय इससे होगा कि आपने अपने कार्यकाल में कितने महत्वपूर्ण काम किये न कि उसकी अवधि। ठीक वैसे ही जैसे यह कहा जाता है कि आपने कितना जीवन जिया, यह महत्वपूर्ण नहीं बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि आपने जीवन जिया कैसे?
(संजीव शुक्ल का लेख)